“हिंदुस्तान जिंक की ‘इकोजेन’ अब टाटा स्टील के ग्रीन स्टील प्रोडक्शन में अहम भूमिका निभाएगी। एशिया का पहला लो-कार्बन जिंक सॉल्यूशन होने से यह साझेदारी स्टील इंडस्ट्री में कार्बन उत्सर्जन घटाने की दिशा में क्रांतिकारी कदम साबित होगी, जो भारतीय मैन्युफैक्चरिंग को ग्लोबल सस्टेनेबिलिटी मानकों पर मजबूत बनाएगी।”
वेदांता का बड़ा मास्टरस्ट्रोक: इकोजेन से स्टील इंडस्ट्री में गेम चेंज
हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड (वेदांता ग्रुप की प्रमुख कंपनी) ने टाटा स्टील के साथ अपनी दो दशक पुरानी साझेदारी को नई ऊंचाई दी है। कंपनी ने ‘इकोजेन’ (EcoZen) नामक अपने लो-कार्बन जिंक सॉल्यूशन को टाटा स्टील के स्टील प्रोडक्शन में शामिल करने का समझौता किया है। यह एशिया का पहला ऐसा लो-कार्बन जिंक है, जो गैल्वनाइजेशन प्रक्रिया में इस्तेमाल होने से स्टील की कार्बन फुटप्रिंट को काफी हद तक कम करता है।
टाटा स्टील, जो भारत की सबसे बड़ी स्टील कंपनियों में से एक है, अब अपने हाई-ग्रेड गैल्वनाइज्ड स्टील प्रोडक्शन के लिए इकोजेन पर निर्भर करेगी। इससे ऑटोमोटिव, कंस्ट्रक्शन और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में इस्तेमाल होने वाले स्टील की क्वालिटी बनी रहेगी, लेकिन पर्यावरण पर असर कम होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम भारतीय स्टील इंडस्ट्री को ग्रीन ट्रांजिशन में लीड करने वाला साबित होगा, खासकर जब ग्लोबल स्तर पर कार्बन टैक्स और सस्टेनेबल सप्लाई चेन की मांग बढ़ रही है।
इकोजेन का प्रोडक्शन प्रोसेस पारंपरिक जिंक से अलग है। इसमें रिन्यूएबल एनर्जी सोर्स का इस्तेमाल, वेस्ट रिडक्शन और एफिशिएंट स्मेल्टिंग टेक्नोलॉजी शामिल है, जिससे CO₂ इमिशन में 20-30% तक की कमी आती है। हिंदुस्तान जिंक, दुनिया की सबसे बड़ी इंटीग्रेटेड जिंक प्रोड्यूसर होने के नाते, अपनी चांदेरिया और देवरी स्मेल्टर्स में यह टेक्नोलॉजी पहले से स्केल कर चुकी है। कंपनी का लक्ष्य है कि अगले कुछ वर्षों में जिंक प्रोडक्शन का बड़ा हिस्सा लो-कार्बन कैटेगरी में आए।
अनिल अग्रवाल, वेदांता के चेयरमैन, लंबे समय से ग्रीन मेटल्स और सस्टेनेबल माइनिंग पर जोर दे रहे हैं। हाल ही में उन्होंने वेस्ट एशिया संकट के बीच घरेलू रिसोर्सेज को अनलॉक करने की बात कही थी, ताकि एनर्जी और मिनरल सिक्योरिटी मजबूत हो। इकोजेन इसी विजन का हिस्सा है। टाटा स्टील के साथ यह डील स्ट्रैटेजिक है क्योंकि दोनों कंपनियां भारतीय इंडस्ट्री में लीडर हैं। टाटा स्टील के पास ग्रीन स्टील प्रोडक्शन के लिए हाइड्रोजन-बेस्ड डायरेक्ट रिडक्शन और कार्बन कैप्चर टेक्नोलॉजी पर काम चल रहा है, जबकि इकोजेन गैल्वनाइजेशन स्टेज पर ग्रीन कंपोनेंट जोड़ता है।
इस साझेदारी के फायदे कई स्तरों पर हैं:
पर्यावरणीय : स्टील प्रोडक्शन में जिंक गैल्वनाइजेशन जरूरी है, लेकिन पारंपरिक तरीके से कार्बन इंटेंसिव होता है। इकोजेन से कुल प्रोडक्ट लाइफसाइकल में इमिशन घटेगा।
आर्थिक : लो-कार्बन मेटल्स की ग्लोबल डिमांड बढ़ रही है। यूरोप और अमेरिका में कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) से भारतीय एक्सपोर्टर्स को फायदा होगा।
इंडस्ट्री स्केल : यह डील अन्य स्टील प्लेयर्स को भी लो-कार्बन जिंक अपनाने के लिए प्रेरित करेगी, जिससे पूरी वैल्यू चेन ग्रीन हो सकती है।
हिंदुस्तान जिंक पहले से ही नेट वॉटर पॉजिटिव बन चुकी है और वेस्ट रिसाइक्लिंग में रिकॉर्ड बना रही है। FY26 में कंपनी ने 85 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी रिसाइकल किया। इकोजेन इसी सस्टेनेबिलिटी रोडमैप का प्रमुख हिस्सा है।
टाटा स्टील के लिए यह मास्टरस्ट्रोक इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कंपनी 2030 तक नेट जीरो टारगेट की ओर बढ़ रही है। इकोजेन जैसे पार्टनरशिप से वह ग्रीन प्रीमियम प्रोडक्ट्स लॉन्च कर सकती है, जो ऑटोमेकर्स और इंफ्रा प्रोजेक्ट्स में ज्यादा डिमांड में होंगे।
यह समझौता भारतीय मैन्युफैक्चरिंग को ग्लोबल ग्रीन इकोनॉमी में इंटीग्रेट करने का मजबूत संकेत है। अनिल अग्रवाल की स्ट्रैटेजी से वेदांता ग्रुप न सिर्फ मेटल्स में लीडर बनेगा, बल्कि सस्टेनेबल इंडस्ट्री ट्रांसफॉर्मेशन में भी अग्रणी भूमिका निभाएगा।
Disclaimer: यह न्यूज रिपोर्ट वर्तमान घटनाक्रम और उपलब्ध जानकारी पर आधारित है। निवेश संबंधी निर्णय से पहले विशेषज्ञ सलाह लें।