“कच्छ के मांडवी से 1870 में शुरू हुई एक हिंदू व्यापारी परिवार की कहानी आज ओमान में 7500 करोड़ से अधिक मूल्य के साम्राज्य के रूप में खड़ी है। खिमजी रामदास ग्रुप के मुखिया कनकसी खिमजी को दुनिया का एकमात्र ‘हिंदू शेख’ का सम्मान मिला, जिनसे सुल्तान काबूस खुद वित्तीय सलाह और सहायता लेते थे। यह कहानी भारत-ओमान के सदियों पुराने व्यापारिक रिश्तों की जीती-जागती मिसाल है, जहां विश्वास और मेहनत से एक हिंदू परिवार ने अरब देश में अभूतपूर्व सम्मान हासिल किया।”
1870 का दौर था जब कच्छ के मांडवी तट से रामदास ठक्करसे नामक एक हिंदू व्यापारी ने अपने बढ़ते कारोबार को तेजी से आगे बढ़ाने के लिए जहाज पर सवार होकर मस्कट की ओर प्रस्थान किया। उस समय ओमान की राजधानी मस्कट एक व्यस्त बंदरगाह था, जहां भारतीय व्यापारी अनाज, चाय, मसाले और कपड़ा लाते थे तथा यहां से खजूर, सूखे नींबू और लोबान जैसी वस्तुएं ले जाते थे। रामदास ने इसी व्यापारिक रास्ते को मजबूत आधार दिया और धीरे-धीरे अपना कारोबार फैलाया। उनके पुत्र खिमजी रामदास ने इसे और मजबूत बनाया, जिसके नाम पर आज खिमजी रामदास ग्रुप जाना जाता है।
यह परिवार कच्छ के भाटिया महाजन समुदाय से था, जो सदियों से समुद्री व्यापार में निपुण था। 19वीं सदी के अंत तक हिंदू व्यापारियों की संख्या मस्कट में हजारों में पहुंच गई थी, लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं थीं। 1895 में इबादी विद्रोह के दौरान हिंदू समुदाय पर हमले हुए, जिससे संख्या घटकर कुछ सौ रह गई। फिर भी, खिमजी परिवार ने धैर्य और बुद्धिमत्ता से अपना स्थान बनाए रखा।
20वीं सदी में गोकलदास खिमजी ने 1920 से 1971 तक परिवार के कारोबार को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। उन्होंने सूखे माल के आयात से शुरुआत की, फिर ओमानी खजूर और नींबू के निर्यातक बने, सरकारी निर्माण ठेकेदार बने और अमेरिकी-यूरोपीय उपभोक्ता वस्तुओं के प्रमुख थोक विक्रेता बन गए। उनका कारोबार इतना प्रभावशाली था कि ओमान के सुल्तान उनसे नियमित रूप से वित्तीय सहायता और सलाह लेते थे।
इस परिवार की सबसे उल्लेखनीय शख्सियत कनकसी खिमजी थे, जिनका जन्म 1936 में मस्कट में हुआ। उन्होंने मुंबई में शिक्षा प्राप्त की और 1970 में परिवार के कारोबार की कमान संभाली। उस समय ओमान तेल से पहले के दौर में था और आर्थिक संसाधन सीमित थे। कनकसी खिमजी ने सुल्तान काबूस बिन सईद को वित्तीय सहायता प्रदान की, जिसमें कर्ज भी शामिल था। उनकी निष्पक्ष व्यापार नीति, धन जुटाने की क्षमता और ओमान के विकास में योगदान से प्रभावित होकर सुल्तान काबूस ने 1970 के दशक में उन्हें ‘शेख’ की उपाधि प्रदान की। यह उपाधि दुनिया में किसी हिंदू को मिलने वाली पहली और एकमात्र थी, जो पारंपरिक रूप से अरब शाही या मुस्लिम नेताओं के लिए आरक्षित होती है।
कनकसी खिमजी (जिन्हें कनक भाई भी कहा जाता था) ने ओमान में भारतीय समुदाय के लिए कई योगदान दिए। 1975 में उन्होंने मस्कट में पहला अंग्रेजी माध्यम भारतीय स्कूल स्थापित किया, जो आज भी हजारों छात्रों को शिक्षा देता है। वे वैष्णव परंपरा के कट्टर अनुयायी रहे, शाकाहारी रहे और हिंदू संस्कृति से गहराई से जुड़े रहे, भले ही ओमानी समाज में पूरी तरह घुल-मिल गए।
आज खिमजी रामदास ग्रुप ओमान के प्रमुख समूहों में शुमार है, जिसमें रिटेल, लॉजिस्टिक्स, निर्माण, फूड और कई क्षेत्र शामिल हैं। इसका अनुमानित मूल्य 7500 करोड़ रुपये से अधिक है (करीब 1 बिलियन डॉलर के आसपास)। परिवार की छठी पीढ़ी अब कारोबार संभाल रही है और ओमान में भारतीय मूल के नागरिकों के रूप में योगदान दे रही है।
यह कहानी सिर्फ एक परिवार की सफलता नहीं, बल्कि भारत-ओमान के 500 साल से अधिक पुराने व्यापारिक-सांस्कृतिक रिश्तों की मिसाल है। कच्छ से मस्कट तक का यह सफर विश्वास, मेहनत और पारस्परिक सम्मान पर टिका है, जहां एक हिंदू व्यापारी को मुस्लिम सुल्तान ने ‘शेख’ का दर्जा देकर इतिहास रच दिया।
## डिस्क्लेमर: यह खबर ऐतिहासिक तथ्यों और उपलब्ध जानकारी पर आधारित है।