भारतीय गणतंत्र के पहले बजट की कहानी, जब ‘चार आने-आठ आने’ के हिसाब से लगता था इनकम टैक्स, इतनी कमाई वालों को थी छूट

“भारत गणतंत्र बनने के बाद 28 फरवरी 1950 को जॉन मथाई ने पेश किया पहला बजट, जिसमें आय 347.5 करोड़ रुपये और व्यय 337.88 करोड़ रुपये अनुमानित था; इनकम टैक्स की दरें आने और पाई में तय होती थीं, जैसे पहली स्लैब में नौ पाई और दूसरी में एक आना नौ पाई; 10,000 रुपये तक की कमाई पर टैक्स घटाया गया; बिजनेस प्रॉफिट टैक्स खत्म किया; बजट लीक होने से मथाई का इस्तीफा हुआ; उस दौर में छूट सीमा 2,500 रुपये के आसपास थी, जबकि उच्च स्लैब में चार से आठ आने तक टैक्स लगता था।”

भारत के गणतंत्र बनने के ठीक एक महीने बाद, 28 फरवरी 1950 को तत्कालीन वित्त मंत्री जॉन मथाई ने संसद में 1950-51 का बजट पेश किया, जो स्वतंत्र भारत का पहला गणतंत्र बजट था। इस बजट में कुल आय का अनुमान 347.5 करोड़ रुपये रखा गया, जबकि व्यय 337.88 करोड़ रुपये होने का पूर्वानुमान था, जिससे 9.62 करोड़ रुपये का अधिशेष निकलता था। बजट की तैयारी के दौरान राष्ट्रपति भवन में छपाई हुई थी, लेकिन पेश होने से पहले ही इसका कुछ हिस्सा लीक हो गया, जिसकी वजह से जॉन मथाई को बाद में इस्तीफा देना पड़ा। उस समय इनकम टैक्स की गणना रुपये पर आने और पाई के हिसाब से होती थी, जहां एक रुपये में 16 आने और एक आने में 12 पाई होते थे।

इस बजट में बिजनेस प्रॉफिट टैक्स को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया, जो व्यापारियों के लिए बड़ी राहत थी, क्योंकि इससे पहले यह टैक्स कंपनियों के मुनाफे पर लगता था। इनकम टैक्स की दरों में बदलाव करते हुए, 10,000 रुपये तक की आय पर टैक्स को एक चौथाई आने से घटाकर पहली स्लैब में नौ पाई (लगभग 4.69%) और दूसरी स्लैब में एक आना नौ पाई (लगभग 10.94%) कर दिया गया। उच्च आय वालों के लिए दरें चार आने (25%) से शुरू होकर आठ आने (50%) तक जाती थीं, जो उस दौर की आर्थिक चुनौतियों को दर्शाती थीं। छूट की सीमा 2,500 रुपये तक रखी गई थी, यानी इतनी कमाई वाले व्यक्ति को इनकम टैक्स से मुक्ति मिलती थी, जबकि आज की तुलना में यह राशि बहुत कम लगती है लेकिन तब की महंगाई दर को देखते हुए यह औसत परिवार के लिए पर्याप्त थी।

See also  पीएम किसान योजना: होली बीत गई, अब कब आएगी 22वीं किस्त? मार्च के मध्य तक खाते में 2-2 हजार रुपये आने की मजबूत उम्मीद

बजट में रेलवे और डिफेंस पर विशेष जोर दिया गया, जहां रेलवे के लिए 100 करोड़ रुपये से ज्यादा का प्रावधान था, जो कुल व्यय का बड़ा हिस्सा था। कृषि क्षेत्र को मजबूत करने के लिए सिंचाई परियोजनाओं पर 20 करोड़ रुपये आवंटित किए गए, जो स्वतंत्रता के बाद की खाद्यान्न कमी को दूर करने की दिशा में कदम था। शिक्षा और स्वास्थ्य पर कुल 15 करोड़ रुपये खर्च का अनुमान था, जिसमें प्राथमिक शिक्षा को प्राथमिकता दी गई। उस समय भारत की जीडीपी लगभग 2,000 करोड़ रुपये के आसपास थी, और बजट इसमें 17% का योगदान देता था, जो आज के 3-4% से काफी ज्यादा था।

इनकम टैक्स की संरचना प्रोग्रेसिव थी, जहां निम्न आय वर्ग को न्यूनतम बोझ पड़ता था। उदाहरण के लिए, 2,500 से 5,000 रुपये की आय पर टैक्स दर तीन पाई प्रति रुपये से शुरू होती थी, जो धीरे-धीरे बढ़कर 10,000 रुपये पर नौ पाई तक पहुंचती थी। 15,000 रुपये से ऊपर की आय पर पांच आने (31.25%) तक टैक्स लगता था, और सबसे ऊपरी स्लैब में आठ आने तक जाता था। यह व्यवस्था ब्रिटिश काल से चली आ रही थी, लेकिन मथाई ने इसे भारतीय जरूरतों के अनुरूप संशोधित किया।

1950 के बजट की मुख्य विशेषताएं:

आय और व्यय का ब्रेकडाउन: रेवेन्यू आय 280 करोड़ रुपये, कैपिटल आय 67.5 करोड़ रुपये; रेवेन्यू व्यय 250 करोड़ रुपये, कैपिटल व्यय 87.88 करोड़ रुपये।

टैक्स रिफॉर्म्स: इनकम टैक्स में छूट सीमा को बनाए रखते हुए दरों को घटाया, जिससे मध्यम वर्ग को राहत मिली।

सेक्टर-वाइज आवंटन: डिफेंस पर 50 करोड़ रुपये, जो कुल बजट का 15% था; परिवहन पर 80 करोड़ रुपये।

See also  New GST Rates: कल से महंगे हो जाएंगे ये प्रोडक्ट्स, 40% जीएसटी के साथ लगेगा उत्पाद शुल्क; ये रही लिस्ट.

आर्थिक संदर्भ: विभाजन के बाद की अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति 5% के आसपास थी, और बजट ने इसे नियंत्रित करने के लिए आयात शुल्क बढ़ाए।

नीचे दी गई तालिका में 1950 के इनकम टैक्स स्लैब्स का विवरण है:

आय की सीमा (रुपये में)टैक्स दर (आने/पाई प्रति रुपये)प्रभावी प्रतिशत (%)
0 – 2,500छूट0
2,501 – 5,000तीन पाई1.56
5,001 – 10,000नौ पाई (घटाकर)4.69
10,001 – 15,000एक आना नौ पाई10.94
15,001 – 20,000चार आने25
20,001 – 30,000छह आने37.5
30,001 और ऊपरआठ आने50

इस तालिका से स्पष्ट है कि उच्च आय पर टैक्स बोझ ज्यादा था, जो सामाजिक न्याय की दिशा में कदम था। बजट में निर्यात को बढ़ावा देने के लिए कॉटन और जूट पर एक्सपोर्ट ड्यूटी घटाई गई, जिससे किसानों को फायदा हुआ। विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करने के लिए आयात पर 10% अतिरिक्त शुल्क लगाया गया। मथाई के बजट भाषण में अर्थव्यवस्था की पारदर्शिता पर जोर दिया गया, जहां उन्होंने एक व्हाइट पेपर जारी किया, जो भारतीय बजट इतिहास में पहली बार था।

बजट लीक की घटना ने सुरक्षा प्रोटोकॉल में बदलाव लाया, जिसके बाद बजट छपाई को प्रेस भवन में स्थानांतरित किया गया। उस समय की मुद्रा व्यवस्था में आने और पाई का इस्तेमाल आम था, और टैक्स कैलकुलेशन में इसे अपनाना सरकारी दस्तावेजों की सटीकता बढ़ाता था। 1950 के बाद के बजटों में यह प्रथा जारी रही, लेकिन 1957 में दशमलव प्रणाली अपनाने के बाद पैसा और नया पैसा में बदलाव आया। मथाई का बजट विभाजन की चुनौतियों से निपटने का प्रयास था, जहां शरणार्थी पुनर्वास पर 10 करोड़ रुपये आवंटित किए गए।

See also  VBL शेयरों में भारी गिरावट: Q3 रिजल्ट्स ने खोला कमजोरी का राज, क्या 2026 में और नीचे जाएगा भाव? अब जानें डिटेल!

प्रमुख आर्थिक संकेतक 1950 में:

मुद्रास्फीति दर: 4-6%।

बेरोजगारी: 10% के आसपास, मुख्यतः ग्रामीण क्षेत्रों में।

निर्यात: 500 करोड़ रुपये, मुख्य रूप से चाय और जूट।

आयात: 600 करोड़ रुपये, जिससे व्यापार घाटा 100 करोड़ रुपये का था।

इस बजट ने योजना आयोग की स्थापना की नींव रखी, जो बाद में 1951 में बनी। टैक्स छूट की व्यवस्था ने छोटे व्यापारियों को प्रोत्साहित किया, जहां 2,500 रुपये की कमाई वाले परिवार बिना टैक्स के जीविका चला सकते थे। उच्च स्लैब में आठ आने का टैक्स अमीरों से राजस्व जुटाने का माध्यम था, जो विकास परियोजनाओं में लगाया गया। कुल मिलाकर, यह बजट गणतंत्र भारत की आर्थिक दिशा तय करने वाला दस्तावेज था।

Disclaimer: यह लेख सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है और किसी भी निवेश, कानूनी या वित्तीय सलाह का प्रतिनिधित्व नहीं करता। जानकारी विभिन्न स्रोतों से संकलित है और परिवर्तनशील हो सकती है।

Leave a Comment