“इकोनॉमिक सर्वे 2025-26 ने यूरिया की खुदरा कीमतों में मामूली वृद्धि की सिफारिश की है, जो 2018 से 242 रुपये प्रति 45 किलोग्राम बैग पर स्थिर है, साथ ही किसानों को प्रति एकड़ आधार पर प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण का सुझाव दिया गया है ताकि मिट्टी की गुणवत्ता सुधार सके। सर्वे ने कृषि निर्यात पर अचानक प्रतिबंधों की आलोचना की, जो सप्लाई चेन को बाधित करते हैं और भारत की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाते हैं, जबकि 2030 तक 100 बिलियन डॉलर के निर्यात लक्ष्य को हासिल करने के लिए स्थिर नीति की जरूरत बताई। इथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम से 1.44 लाख करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा बचत हुई है, लेकिन मक्का-आधारित इथेनॉल की ऊंची कीमतों के कारण किसान दालों और तिलहन से मक्का की ओर शिफ्ट हो रहे हैं, जो खाद्य सुरक्षा को खतरे में डाल रहा है और खाद्य तेल आयात पर निर्भरता बढ़ा रहा है।”
इकोनॉमिक सर्वे 2025-26 ने कृषि क्षेत्र में संरचनात्मक असंतुलनों पर गहन विश्लेषण किया है, जिसमें यूरिया सब्सिडी की वजह से मिट्टी के पोषक तत्वों में असंतुलन प्रमुख है। सर्वे के अनुसार, नाइट्रोजन-फॉस्फोरस-पोटैशियम (एन:पी:के) अनुपात 2009-10 में 4:3.2:1 से बिगड़कर 2023-24 में 10.9:4.1:1 हो गया है, जबकि अधिकांश फसलों के लिए आदर्श अनुपात 4:2:1 है। यूरिया की कम कीमत के कारण किसान इसका अत्यधिक उपयोग कर रहे हैं, जो मिट्टी की उर्वरता को कम कर रहा है और फसल उत्पादकता को प्रभावित कर रहा है। सर्वे ने सुझाव दिया कि यूरिया की कीमत में मामूली वृद्धि से सब्सिडी बोझ कम होगा, जो वर्तमान में सरकार के बजट का बड़ा हिस्सा है, और किसानों को प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण से आय समर्थन मिलेगा।
कृषि निर्यात नीति में अस्थिरता पर सर्वे ने चिंता जताई है। 2024-25 में कृषि निर्यात 51.1 बिलियन डॉलर रहा, लेकिन वैश्विक कृषि व्यापार में भारत की हिस्सेदारी मात्र 2.2 प्रतिशत है। अचानक निर्यात प्रतिबंध या न्यूनतम निर्यात मूल्य जैसे उपाय घरेलू मुद्रास्फीति को नियंत्रित तो करते हैं, लेकिन विदेशी खरीदारों को अन्य स्रोतों की ओर धकेलते हैं। सर्वे ने चेतावनी दी कि एक बार खोए हुए बाजार को दोबारा हासिल करना मुश्किल होता है, जिससे भारत की उच्च गुणवत्ता वाली कृषि उत्पादों की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचता है। 2019-20 से 2024-25 तक कृषि निर्यात की कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट 8.2 प्रतिशत रही, जो कुल माल निर्यात की 6.9 प्रतिशत से अधिक है, लेकिन 2022-23 से 2024-25 तक इसमें ठहराव आया है, जबकि वैश्विक कृषि व्यापार 2.3 ट्रिलियन डॉलर से बढ़कर 2.4 ट्रिलियन डॉलर हो गया।
इथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम की सफलताओं के साथ-साथ जोखिमों पर भी सर्वे ने ध्यान केंद्रित किया। अगस्त 2025 तक इस कार्यक्रम से 1.44 लाख करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा बचत हुई और 245 लाख मीट्रिक टन कच्चे तेल का प्रतिस्थापन हुआ। 2023-24 में औसत ब्लेंडिंग रेट 14.6 प्रतिशत रहा, जो पिछले वर्ष के 12.06 प्रतिशत से अधिक है, और मई 2024 में यह 15.4 प्रतिशत तक पहुंच गया। सरकार का लक्ष्य 2030 तक 30 प्रतिशत ब्लेंडिंग है, लेकिन मक्का-आधारित इथेनॉल की प्रशासित कीमतों में 2022 से 2025 तक 11.7 प्रतिशत की कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट ने किसानों को दालों व तिलहन से मक्का की ओर आकर्षित किया है। इससे फसल विविधता प्रभावित हो रही है, खाद्य तेल आयात पर निर्भरता बढ़ रही है और आपूर्ति झटकों के दौरान खाद्य कीमतों में अस्थिरता का खतरा उत्पन्न हो रहा है। सर्वे ने ऊर्जा आत्मनिर्भरता और खाद्य आत्मनिर्भरता के बीच उभरते तनाव को रेखांकित किया, सुझाव दिया कि नीतियां संतुलित हों ताकि मक्का की बढ़ती खेती से पल्स और ऑयलसीड्स का उत्पादन न घटे।
यूरिया सब्सिडी और मिट्टी स्वास्थ्य पर प्रभाव
सर्वे ने यूरिया के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी में पोषक असंतुलन को विस्तार से समझाया। नीचे दी गई तालिका प्रमुख राज्यों में एन:पी:के अनुपात के बदलाव को दर्शाती है:
| राज्य | 2009-10 अनुपात | 2023-24 अनुपात | आदर्श अनुपात | प्रभावित फसलें |
|---|---|---|---|---|
| पंजाब | 4.5:3:1 | 12:4:1 | 4:2:1 | गेहूं, धान |
| हरियाणा | 4.2:3.1:1 | 11.5:4:1 | 4:2:1 | गेहूं, सरसों |
| उत्तर प्रदेश | 3.8:2.8:1 | 10:3.8:1 | 4:2:1 | गन्ना, आलू |
| बिहार | 4:3:1 | 9.5:4:1 | 4:2:1 | धान, मक्का |
यह असंतुलन फसल उपज को 15-20 प्रतिशत तक कम कर रहा है। सर्वे ने प्रस्तावित कि यूरिया कीमत वृद्धि के साथ प्रति एकड़ 500-700 रुपये का प्रत्यक्ष हस्तांतरण किसानों को मिट्टी परीक्षण और संतुलित उर्वरक उपयोग को प्रोत्साहित करेगा।
कृषि निर्यात नीति की चुनौतियां और सुझाव
सर्वे ने निर्यात प्रतिबंधों के उदाहरण दिए, जैसे चावल और प्याज पर हालिया रोक, जो घरेलू कीमतों को स्थिर तो करती हैं लेकिन वैश्विक बाजार में भारत की हिस्सेदारी घटाती हैं। प्रमुख सुझाव:
स्थिर निर्यात नीति अपनाएं, जिसमें बफर स्टॉक प्रबंधन और एंटी-होर्डिंग उपाय शामिल हों।
प्रसंस्करण सुविधाओं और इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश बढ़ाएं, जैसे कोल्ड चेन और लॉजिस्टिक्स।
कृषि, समुद्री उत्पाद और खाद्य पेय निर्यात को 100 बिलियन डॉलर तक पहुंचाने के लिए उत्पाद-विशिष्ट रणनीतियां विकसित करें।
उत्पादन अस्थिरता से निपटने के लिए फसल बीमा और बाजार हस्तक्षेप को मजबूत करें।
2024 में वैश्विक कृषि व्यापार में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए, सर्वे ने सुझाव दिया कि निर्यात प्रतिबंधों की बजाय सब्सिडाइज्ड वितरण और बाजार हस्तक्षेप का उपयोग किया जाए।
इथेनॉल ब्लेंडिंग के लाभ और जोखिम
सर्वे ने इथेनॉल कार्यक्रम की उपलब्धियों को सूचीबद्ध किया:
विदेशी मुद्रा बचत: 1.44 लाख करोड़ रुपये।
कच्चा तेल प्रतिस्थापन: 245 लाख मीट्रिक टन।
ब्लेंडिंग रेट वृद्धि: 2023-24 में 14.6 प्रतिशत, लक्ष्य 20 प्रतिशत तक 2025।
किसानों को लाभ: गन्ना और मक्का की ऊंची कीमतों से आय में 10-15 प्रतिशत वृद्धि।
लेकिन जोखिमों पर फोकस करते हुए, सर्वे ने मक्का क्षेत्र में वृद्धि का विश्लेषण किया। 2022-25 के बीच मक्का-आधारित इथेनॉल की कीमतें 11.7 प्रतिशत सीएजीआर से बढ़ीं, जबकि चावल या गुड़ आधारित की 5-7 प्रतिशत। इससे मक्का क्षेत्र 15 प्रतिशत बढ़ा, लेकिन दालों और तिलहन क्षेत्र 8-10 प्रतिशत घटा। नीचे तालिका में फसल शिफ्ट का प्रभाव:
| फसल प्रकार | 2022 क्षेत्र (मिलियन हेक्टेयर) | 2025 क्षेत्र (मिलियन हेक्टेयर) | उत्पादन प्रभाव | आयात निर्भरता वृद्धि |
|---|---|---|---|---|
| मक्का | 9.5 | 11 | +20% | एन/ए |
| दालें | 28 | 25.5 | -12% | +15% |
| तिलहन | 30 | 27 | -10% | +18% (खाद्य तेल) |
यह शिफ्ट खाद्य कीमतों में 5-7 प्रतिशत अस्थिरता पैदा कर रहा है। सर्वे ने सुझाव दिया कि दूसरी पीढ़ी के इथेनॉल (जैसे कृषि अवशेष से) को प्राथमिकता दें और कीमत संकेतों को संतुलित करें ताकि फसल विविधता बनी रहे।
सर्वे ने समग्र रूप से कृषि उत्पादकता बढ़ाने के लिए डिजिटल टूल्स, जैसे सॉयल हेल्थ कार्ड और सैटेलाइट मॉनिटरिंग, का उपयोग सुझाया, जो मिट्टी स्वास्थ्य को 20 प्रतिशत तक सुधार सकते हैं। साथ ही, निर्यात प्रोत्साहन के लिए पीएलआई जैसी स्कीमों को कृषि में विस्तारित करने की बात की गई। इथेनॉल के मामले में, सर्वे ने नीति समीक्षा की जरूरत बताई ताकि ऊर्जा लक्ष्यों से खाद्य सुरक्षा प्रभावित न हो।
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